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Antargyan & Antardrishti

An Alto Mind initiative to cultivate Antargyan, the profound self-knowledge and Antardrishti, the deep intuitive vision for conscious transformation, inner clarity and peaceful being.

Antargyan

Discover the depths of inner knowledge.

Antargyan


शरीर और मन का संबंध उतना ही गहरा है, जितना बीज और मिट्टी का। जब मन उदास होता है, तो कंधे झुक जाते हैं, सांस उथली हो जाती है, चाल धीमी पड़ जाती है। और जब शरीर कमज़ोर होता है, तो मन भी नकारात्मकता में डूबने लगता है...

लेकिन यह संबंध दोनों दिशाओं में काम करता है। जब आप सीधे बैठते हैं, गहरी सांस लेते हैं, तेज़ चाल से चलते हैं, तो मन भी ऊर्जावान हो जाता है। इसीलिए हमारे योग शास्त्र ने शरीर को साधना का पहला द्वार माना। प्राणायाम सिर्फ फेफड़ों की कसरत नहीं, बल्कि वह मन को बदलने का सबसे तेज़ रास्ता है। आज से अपने शरीर की भाषा बदलें, मन अपने आप बदलने लगेगा।
Capt. Sunder Chand Thakur

Antardrishti

Perceptive insights and articles.

Antardrishti


कामयाबी का महामंत्र – पाने नहीं, देने की फिराक में रहो
यह कहानी सोशल मीडिया में बहुत प्रचलित है। आपने भी पढ़ी होगी। एक बार फिर से पढ़ें। एक बार एक किसान ने अपने पड़ोसी को हर साल अपनी फसल का सबसे अच्छा बीज देना शुरू किया. किसी ने पूछा - तुम अपना सबसे अच्छा बीज दूसरे को क्यों देते हो? उसने मुस्कुराकर कहा - क्योंकि हवा बीज को उड़ाकर मेरे खेत में भी लाती है...
"अगर पड़ोसी का बीज कमज़ोर होगा, तो मेरी फसल भी कमज़ोर होगी। यह छोटी-सी कहानी एक बहुत बड़ा सत्य कहती है। जो हम देते हैं, वह किसी न किसी रूप में हमारे पास लौटकर आता है। यह केवल नैतिक उपदेश नहीं है। यह ब्रह्मांड का सबसे मूलभूत नियम है।"

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां पाने की होड़ इतनी तीव्र है कि देने की वृत्ति कहीं पीछे छूट गई है। हर रिश्ते में पहले यह देखा जाता है कि मुझे क्या मिलेगा। हर कार्य में पहले यह सोचा जाता है कि मेरा लाभ क्या है। और इस गणित में हम यह भूल जाते हैं कि जीवन का असली प्रवाह देने से शुरू होता है, पाने से नहीं।

प्रकृति को देखिए। सूरज हर सुबह उगता है बिना किसी अपेक्षा के। नदी बहती रहती है बिना हिसाब रखे कि किसे पानी दिया और किसे नहीं। पेड़ फल देता है यह सोचे बिना कि खाने वाला उसे कुछ लौटाएगा या नहीं। यही प्रकृति का स्वभाव है। और वेदांत कहता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वभाव भी यही है क्योंकि वह उसी चेतना का अंश है जिसने यह सारी सृष्टि रची है। देना हमारा स्वभाव है जबकि मांगना हमारी आदत बन गई है।

विज्ञान भी अब वही बात कह रहा है जो हमारे ऋषि हज़ारों साल से कहते आए हैं। जब हम किसी को कुछ देते हैं, कुछ भी, समय, प्रेम, सहायता, ज्ञान, तब हमारे मस्तिष्क में oxytocin और serotonin नामक हॉर्मोंस का स्राव होता है। यही वे रसायन हैं जो हमें गहरी संतुष्टि और आनंद देते हैं। अर्थात् देने का पहला लाभ देने वाले को ही मिलता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने यज्ञ की अवधारणा समझाते हुए कहा है कि यह सृष्टि एक यज्ञ है जिसमें सब एक-दूसरे को देते हैं और इसी से जीवन चलता है। जब यह चक्र टूटता है, जब केवल लेने की वृत्ति हावी होती है, तब जीवन में असंतुलन आता है।

देना केवल धन देना नहीं है। देना अपना समय देना भी है। किसी को ध्यान से सुनना, किसी की तकलीफ में साथ खड़े रहना। देना अपना ज्ञान देना भी है। देना अपनी मुस्कान देना है - किसी अजनबी को भी। देना अपनी ऊर्जा देना है - किसी के काम को बेहतर बनाने में।

और जब यह देने की वृत्ति जीवन में उतरती है, तो एक अद्भुत परिवर्तन होता है। जो हम देते हैं, वह गुणित होकर लौटता है। प्रेम दिया तो प्रेम मिला। विश्वास दिया तो विश्वास मिला। ज्ञान बांटा तो ज्ञान और गहरा हुआ। क्योंकि देना ही सबसे बड़ा पाना है।
Capt. Sunder Chand Thakur
Capt. Sunder Chand Thakur

CAPT. SUNDER CHAND THAKUR

Founder & Director, Alto Mind

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